गुरुवार, 31 जुलाई 2008

इश्क़ है आसाँ मगर...

इश्क़ है आसाँ मगर मुश्किल भी है
है वही महबूब जो क़ातिल भी है

दिल लुटाना है तो पहले देख ले
क्या तेरे पहलू में कोई दिल भी है

उनकी आंखों का समंदर तैर लूँ
उस तरफ़ बांहों का इक साहिल भी है

वो मिरी आंखों से छुपता है मगर
वो मिरे हर दर्द में शामिल भी है

रात रोकर इश्क़ में काटी तो है
क्या तेरे इस दर्द का हासिल भी है

है ख़बर उसको मिरे अंदाज़ की
वो मिरे एहसास से गाफिल भी है

जिंदगी गुजरी है 'तनहा' राह में
साथ में जैसे चली मंजिल भी है

- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '

सोमवार, 7 जुलाई 2008

जुल्फें न यूं बिखेरो ...

जुल्फें न यूं बिखेरो आँचल न यूं उड़ाओ
सावन के बादलों पे थोड़ा सा तरस खाओ

बरसात का ये मौसम जायेगा कर के पागल
मेरे क़रीब आ के चूड़ी न खनकनाओ

तिरछी नज़र से मुझको देखो न मुस्कुरा के
दीवाना हूँ मुझे तुम इतना न आजमाओ

गाती हुई घटा का संगीत थम न जाए
बूंदों की ताल पे तुम पायल न छ्नछ्नाओ

बांधा है मुश्किलों से छोटा - सा आशियाना
अंगड़ाई के बहाने बिजली न तुम गिराओ

- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '