आरज़ू कुछ लुटी लुटी सी है
ज़िन्दगी आजकल रुकी सी है
आपसे बात कम हुई जब से
हर तरफ़ कुछ कमी कमी सी है
आजकल हर घड़ी ख़यालों में
एक सूरत भली भली सी है
उनकी आंखों में डर रिवाजों का
मेरी आंखों में कुछ नमी सी है
वो चले छोड़ कर हमें 'तनहा'
रात भर जान पे बनी सी है
- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'
Tuesday, October 13, 2009
Sunday, August 23, 2009
चल पड़े ये सोच कर हम ...
चल पड़े ये सोचकर हम वो कहीं टकराएँ तो
हम बहुत आराम से हैं फिर हमें तड़पाएँ तो
वो हमारी आशिकी को खेल ही समझा किए
सीख लें हम भी मुहब्बत वो हमें सिखलाएँ तो
हम न देखेंगे पलट के जानिबे जानाँ कभी
वो हमारे ख्व़ाब का घर छोड़कर के जाएँ तो
फिर खनकता शेर कोई मैं लिखूँ इस रात पे
वो मेरी पलकों पे अपनी जुल्फ़ को बिख़राएँ तो
भूल जाएँगे पुराने ज़ख्म़ की हर टीस हम
वो हमें ताज़ा-सा कोई ज़ख्म़ देकर जाएँ तो
एक 'तनहा' की तड़प का आपको अहसास हो
इश्क में दो चार आँसू आपको मिल जाएँ तो
- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '
हम बहुत आराम से हैं फिर हमें तड़पाएँ तो
वो हमारी आशिकी को खेल ही समझा किए
सीख लें हम भी मुहब्बत वो हमें सिखलाएँ तो
हम न देखेंगे पलट के जानिबे जानाँ कभी
वो हमारे ख्व़ाब का घर छोड़कर के जाएँ तो
फिर खनकता शेर कोई मैं लिखूँ इस रात पे
वो मेरी पलकों पे अपनी जुल्फ़ को बिख़राएँ तो
भूल जाएँगे पुराने ज़ख्म़ की हर टीस हम
वो हमें ताज़ा-सा कोई ज़ख्म़ देकर जाएँ तो
एक 'तनहा' की तड़प का आपको अहसास हो
इश्क में दो चार आँसू आपको मिल जाएँ तो
- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '
Saturday, June 6, 2009
मीत नहीं , गीत नहीं ...
मीत नहीं गीत नहीं
प्रेम नहीं प्रीत नहीं
है ये ज़िन्दगी काँटों की चुभन !
बैर पड़ी कोयलिया काहे को कूकती
तन मन में तीर चुभे उठती है हूक सी
पीपल की छाँव नहीं
प्रीतम का गाँव नहीं
शूल मारती बैरन पवन !!
पीर कैसे तुम किसी की जानोगे भला
दिल तुम्हारा पत्थरों के सांचे में ढला
सांझ नहीं भोर नहीं
शबनमी हिलोर नहीं
विवशताओं की दहकती अगन !!!
मीत हमसे खेल रहा आँख मिचोली
प्रीत की ये रीत बनी जग में ठिठोली
आस नहीं प्यास नहीं
अब कोई तलाश नहीं
नैन आ बसे टूटते सपन !!!!
-- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'
प्रेम नहीं प्रीत नहीं
है ये ज़िन्दगी काँटों की चुभन !
बैर पड़ी कोयलिया काहे को कूकती
तन मन में तीर चुभे उठती है हूक सी
पीपल की छाँव नहीं
प्रीतम का गाँव नहीं
शूल मारती बैरन पवन !!
पीर कैसे तुम किसी की जानोगे भला
दिल तुम्हारा पत्थरों के सांचे में ढला
सांझ नहीं भोर नहीं
शबनमी हिलोर नहीं
विवशताओं की दहकती अगन !!!
मीत हमसे खेल रहा आँख मिचोली
प्रीत की ये रीत बनी जग में ठिठोली
आस नहीं प्यास नहीं
अब कोई तलाश नहीं
नैन आ बसे टूटते सपन !!!!
-- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'
Wednesday, April 1, 2009
कौन है कवि ?
गीत !
नहीं , प्रियतमा की याद
यादों से प्रीत
बन जाती है स्वयं गीत !
मुझे याद है
प्रथम मिलन
तुम शाम ढले
दरिया किनारे
नयनों के दरिया से
छलका गयीं थी ' प्रेम '
दे गयीं थी ' मीठी चुभन '
बन गयी जो ' चाह'
चाह की भावना के ' शब्द '
यही शब्द सजोये मैंने
बना कर गीत !
तुम ही कहो
कौन है कवि ?
मैं या तुम
या हम दोनों की प्रीत !!!
नहीं , प्रियतमा की याद
यादों से प्रीत
बन जाती है स्वयं गीत !
मुझे याद है
प्रथम मिलन
तुम शाम ढले
दरिया किनारे
नयनों के दरिया से
छलका गयीं थी ' प्रेम '
दे गयीं थी ' मीठी चुभन '
बन गयी जो ' चाह'
चाह की भावना के ' शब्द '
यही शब्द सजोये मैंने
बना कर गीत !
तुम ही कहो
कौन है कवि ?
मैं या तुम
या हम दोनों की प्रीत !!!
Saturday, November 15, 2008
हम चल दिए ...
हम चले हम चल दिए हम चल पड़े
आज फिर माथे पे उनके बल पड़े
नींद सहलाएगी माथा उम्र भर
आँख पे माँ का अगर आँचल पड़े
आज हम पे आ पड़ा है वक्त ये
आप की किस्मत में शायद कल पड़े
रुक गए मेरे कदम क्यों दफअतन
रास्ते कुछ दूर जो समतल पड़े
ख़त मिला बेटे का बूढ़े बाप को
बाप की आँखों से मोती ढ़ल पड़े
रात गुज़री किस तरह मत पूछिये
देखिये बिस्तर में कितने सल पड़े
इक तसव्वुर एक 'तनहा' रात थी
हर तरफ़ लाखों दिए क्यों जल पड़े
- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '
आज फिर माथे पे उनके बल पड़े
नींद सहलाएगी माथा उम्र भर
आँख पे माँ का अगर आँचल पड़े
आज हम पे आ पड़ा है वक्त ये
आप की किस्मत में शायद कल पड़े
रुक गए मेरे कदम क्यों दफअतन
रास्ते कुछ दूर जो समतल पड़े
ख़त मिला बेटे का बूढ़े बाप को
बाप की आँखों से मोती ढ़ल पड़े
रात गुज़री किस तरह मत पूछिये
देखिये बिस्तर में कितने सल पड़े
इक तसव्वुर एक 'तनहा' रात थी
हर तरफ़ लाखों दिए क्यों जल पड़े
- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '
Thursday, July 31, 2008
इश्क़ है आसाँ मगर...
इश्क़ है आसाँ मगर मुश्किल भी है
है वही महबूब जो क़ातिल भी है
दिल लुटाना है तो पहले देख ले
क्या तेरे पहलू में कोई दिल भी है
उनकी आंखों का समंदर तैर लूँ
उस तरफ़ बांहों का इक साहिल भी है
वो मिरी आंखों से छुपता है मगर
वो मिरे हर दर्द में शामिल भी है
रात रोकर इश्क़ में काटी तो है
क्या तेरे इस दर्द का हासिल भी है
है ख़बर उसको मिरे अंदाज़ की
वो मिरे एहसास से गाफिल भी है
जिंदगी गुजरी है 'तनहा' राह में
साथ में जैसे चली मंजिल भी है
- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '
है वही महबूब जो क़ातिल भी है
दिल लुटाना है तो पहले देख ले
क्या तेरे पहलू में कोई दिल भी है
उनकी आंखों का समंदर तैर लूँ
उस तरफ़ बांहों का इक साहिल भी है
वो मिरी आंखों से छुपता है मगर
वो मिरे हर दर्द में शामिल भी है
रात रोकर इश्क़ में काटी तो है
क्या तेरे इस दर्द का हासिल भी है
है ख़बर उसको मिरे अंदाज़ की
वो मिरे एहसास से गाफिल भी है
जिंदगी गुजरी है 'तनहा' राह में
साथ में जैसे चली मंजिल भी है
- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '
Labels:
ग़ज़ल एहसास की
Monday, July 7, 2008
जुल्फें न यूं बिखेरो ...
जुल्फें न यूं बिखेरो आँचल न यूं उड़ाओ
सावन के बादलों पे थोड़ा सा तरस खाओ
बरसात का ये मौसम जायेगा कर के पागल
मेरे क़रीब आ के चूड़ी न खनकनाओ
तिरछी नज़र से मुझको देखो न मुस्कुरा के
दीवाना हूँ मुझे तुम इतना न आजमाओ
गाती हुई घटा का संगीत थम न जाए
बूंदों की ताल पे तुम पायल न छ्नछ्नाओ
बांधा है मुश्किलों से छोटा - सा आशियाना
अंगड़ाई के बहाने बिजली न तुम गिराओ
- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '
सावन के बादलों पे थोड़ा सा तरस खाओ
बरसात का ये मौसम जायेगा कर के पागल
मेरे क़रीब आ के चूड़ी न खनकनाओ
तिरछी नज़र से मुझको देखो न मुस्कुरा के
दीवाना हूँ मुझे तुम इतना न आजमाओ
गाती हुई घटा का संगीत थम न जाए
बूंदों की ताल पे तुम पायल न छ्नछ्नाओ
बांधा है मुश्किलों से छोटा - सा आशियाना
अंगड़ाई के बहाने बिजली न तुम गिराओ
- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '
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