सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

तुम्हारे इश्क़ में ...

तुम्हारे इश्क़ में आँसू छुपा के जी लेंगे
हरेक ग़म की क़सम मुस्कुरा के जी लेंगे

किया है इश्क़ तो फिर दर्द से गिला कैसा
तुम्हारे दर्द से हम दिल लगा के जी लेंगे

ये इश्क़ रोग सही जान ले के जाए तो
ख़ुदा क़सम तुम्हें हम जाँ बना के जी लेंगे

तुम्हारी याद करेगी कभी परेशाँ तो
तुम्हारी ताज़ा ग़ज़ल गुनगुना के जी लेंगे

तुम्हारा साथ मिले ना मिले मगर 'तनहा'
तुम्हारे सज़दे में सब कुछ लुटा के जी लेंगे

- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'

7 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

Wah!kya gazab gazal kahee hai!

gaurav ने कहा…

kya bat he sir.....

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

तुम्हारी याद करेगी कभी परेशां तो
तुम्हारी ताज़ा ग़ज़ल गुनगुना के जी लेंगे

अच्छा तरीका है यह … :)
हम भी ऐसा ही किया करेंगे … … … !
आपकी अन्य पोस्ट्स भी पढ़ीं … सारी छांदस रचनाएं अच्छी लगीं … मुबारकबाद !

* श्रीरामनवमी की शुभकामनाएं ! *

- राजेन्द्र स्वर्णकार

ज्योति सिंह ने कहा…

किया है इश्क़ तो फिर दर्द से गिला कैसा
तुम्हारे दर्द से हम दिल लगा के जी लेंगे
sach kaha dil ko bahalna hi padta hai
kisi na kisi raste le jaana hi padhta .sundar rachna .

ZEAL ने कहा…

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प्रमोद जी ,

बहुत सुन्दर रचना है । भावुक करती पंक्तियाँ । बहुत पसंद आयीं।

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राकेश कौशिक ने कहा…

"तुम्हारी याद करेगी कभी परेशाँ तो
तुम्हारी ताज़ा ग़ज़ल गुनगुना के जी लेंगे"

वाह वाह - बहुत खूब

संजय भास्‍कर ने कहा…

बढ़िया रचना एक अलग अंदाज में,
सुंदर लगी !