शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

ग़ज़ल ... सिर्फ़ हम थे



                                   ग़ज़ल

शरीक़े   ग़म   तुम्हारे    सिर्फ़   हम   थे  
ज़माने   के   सितम  थे  सिर्फ़   हम   थे  

फ़क़त   इक   बार  तुमसे   बात  की  थी 
निशाने   पे   सभी   के   सिर्फ़   हम  थे  

तुम्हारे    साथ    लाखों        मुस्कुराये
तुम्हारे   साथ   सिसके   सिर्फ़   हम   थे        

ग़ज़ल    की   बात   करते   थे   हज़ारों 
ग़ज़ल  से   बात   करते   सिर्फ़  हम   थे  

चलेंगे    साथ    था   वादा      तुम्हारा 
चले   'तनहा'  सफ़र   पे   सिर्फ़  हम  थे   


          - प्रमोद  कुमार  कुश  'तनहा' 

       www.reverbnation.com/pkkush

5 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

Hameshakee tarh,sanjeeda,bemilaal rachnaye...maine eksaah teen to dali...aur padhnaka man hai....dard karan adhik samaytak baith nahi pati.
Uf! aap ye word verication nikal deejiye....iske badle comment moderation rakhe pls....tippani deneme aasani hogi....ye teesri baar post karneki koshish me hun...

Pramod Kumar Kush 'tanha' ने कहा…

बहुत शुक्रिया .. आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत ख़ास है ... हमेशा की तरह दिल से निकली सच्ची भावनाएं ...

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

Bahut Umda

संजय भास्‍कर ने कहा…

वाह.............
बहुत सुन्दर रचना..

मदन मोहन सक्सेना ने कहा…

बहुत सुंदर .बेह्तरीन अभिव्यक्ति !शुभकामनायें.
कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.
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