मंगलवार, 15 जनवरी 2008

मुझे सपने नहीं आते ....

आजकल
मुझे सपने नहीं आते ।
क्योंकि
सपनों के लिए
आवश्यकता है नींद की ,
और नींद उड़ चुकी है
कब की
रोज़ की चीख़ पुकार में ।
धर्म और राजनीति की
उठक - पठक
एवं व्यवसायिक जोड़ - तोड़ में ।

आजकल
खुली आंखों से देखता हूँ
तस्वीरें -
मरती हुई सभ्यता ,
सिसकती हुई संस्कृति
एवं
दम तोड़ती हुई
इंसानियत की ।

2 टिप्‍पणियां:

विनय प्रजापति 'नज़र' ने कहा…
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विनय प्रजापति 'नज़र' ने कहा…

सरल सोच और गहरा भाव दोनों हैं आपकी इस नज़्म में|