रविवार, 30 मार्च 2008

तुम कविता हो ...

मैं कवि ! प्रिये तुम कविता हो
मैं प्यासा तट तुम सरिता हो
है साथ हमारा युग - युग से
युग - युग तक साथ निभाना है

सौ बार बने सौ बार मिटे
तन की मिट्टी से क्या लेना ?
केवल मन के बन्धन सच्चे
मन - बन्धन में बन्ध जाना है !!

युग - युग तक साथ निभाना है ...

हर जन्म हुई अपनी रचना
तुम ' शीरी ' मैं ' फ़रहाद ' बना
तुम ' लैला ' की आवाज़ बनीं
मैं ' मजनूँ ' की फ़रियाद बना
तुम ' राधा ' थीं मैं ' श्याम ' बना
तुम ' सीता ' और मैं ' राम ' बना
हर बार नई सूरत पाई
हर बार नया एक ' नाम ' बना

हर जन्म ' तुम्हें ' पाया मैनें
हर जन्म ' तुम्हें ' ही पाना है
केवल मन के बन्धन सच्चे
मन - बन्धन में बन्ध जाना है !!

युग - युग तक साथ निभाना है ...

-- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '

गुरुवार, 6 मार्च 2008

यूं ही चलते हुए ...

यूं ही चलते हुए रुका होगा
फ़िर तेरे शहर में लुटा होगा

उसकी आँखें बहुत छलकती हैं
वो समंदर से खेलता होगा

ख़्वाब आते हैं बंद पलकों में
रात भर जागने से क्या होगा

आज माँ बाप की दुआ ले लूँ
मेरा आँगन हरा भरा होगा

कुछ तुम्हारी जफ़ा से टूटे हैं
कुछ मुक़द्दर में ही लिखा होगा

रूठकर चल दिया मगर 'तनहा'
फ़िर किसी मोड़ पर खडा होगा