गुरुवार, 6 मार्च 2008

यूं ही चलते हुए ...

यूं ही चलते हुए रुका होगा
फ़िर तेरे शहर में लुटा होगा

उसकी आँखें बहुत छलकती हैं
वो समंदर से खेलता होगा

ख़्वाब आते हैं बंद पलकों में
रात भर जागने से क्या होगा

आज माँ बाप की दुआ ले लूँ
मेरा आँगन हरा भरा होगा

कुछ तुम्हारी जफ़ा से टूटे हैं
कुछ मुक़द्दर में ही लिखा होगा

रूठकर चल दिया मगर 'तनहा'
फ़िर किसी मोड़ पर खडा होगा

4 टिप्‍पणियां:

sunita (shanoo) ने कहा…

रूठकर चल दिया मगर 'तनहा'
फ़िर किसी मोड़ पर खडा होगा
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ है...

Sanyukta ने कहा…

Hi. Thanks a lot for visiting and commenting on my blog Woods of Words (woodsofwords.blogspot.com) That page has indeed been graced by your visit. However, I'm not blogging anymore there and sanyukta28.blogspot.com is my primary blog these days. i would be grateful if you would visit that too, sometime.
Thanks. :)

*KHUSHI* ने कहा…

tanha ji....bahut hi sunder likha hai apane....

seema gupta ने कहा…

कुछ तुम्हारी जफ़ा से टूटे हैं
कुछ मुक़द्दर में ही लिखा होगा
' kmal ka ijhaar-e-dil hai ye"
wonderful combinations
Regards

"dil jlaa dard-e-gum ke rusvayeeno mey kyun sochen,
shayad koee krj taira adaa kernaa likha hua hoga...."