शनिवार, 24 मई 2008

बैठे हैं इंतज़ार में...

'तनहा' उदास रात के लमहों की खैर हो
इक शम्म जल उठी है अंधेरों की खैर हो

बैठे हैं इंतज़ार में लौटेंगे वो कभी
बरसों की बात छोड़िये सदियों की खैर हो

होठों पे एक बात है होती नहीं बयाँ
सोचा है आज कह भी दें लफ़्ज़ों की खैर हो

उनको छुआ कि जिस्म को बिजली ने छू लिया
देखा है उनको बारहा आंखों की खैर हो

मौजों से आज हो गयी तूफाँ की दोस्ती
दरिया है बेलगाम किनारों की खैर हो

-- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'

शनिवार, 3 मई 2008

आंसू भी खनकते हैं ...

हंसते हैं उजालों में रातों में तड़पते हैं
जज़्बात मुहब्बत के मुश्किल से संभलते हैं

ये इश्क नहीं आसाँ दरिया है शरारों का
जो मौज से बचते हैं साहिल पे पिघलते हैं

ज़ख्मों की कमाई है ख़्वाबों के खजाने हैं
पलकों की तिजोरी में आंसू भी खनकते हैं

जब याद सताती है भूले से सितमगर की
इक साथ कई शीशे नस नस में चट्कते हैं

आंखों की लड़ाई में कुछ हाथ नहीं आता
इस खेल में शातिर भी करवट ही बदलते हैं

कुछ वस्ल के अफ़साने कुछ हिज्र के नजराने
'तनहा' की निगाहों में दिन रात मचलते हैं

--- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा'