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शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

बस तेरा सिर्फ तेरा मुझको साथ चाहिए ...

इस ज़िन्दगी को यार की सौग़ात चाहिए
प्यासी नज़र को प्यार की बरसात चाहिए

कब से मचल रहा है तेरे इंतज़ार में
इस बेक़रार दिल पे तेरा हाथ चाहिए

तू सामने बैठे मैं तुझे देखता रहूँ
मंज़र यही निगाह को दिन रात चाहिए

नींदों से इल्तिज़ा यही करता हूँ आजकल
ख़्वाबों में रोज़ तुमसे मुलाक़ात चाहिए

उनका ख़याल मेरा जुनूँ एक हो लिए
अब किस लिए ये डोली ये बारात चाहिए

दुनिया मिले मिले न मिले कोई ग़म नहीं
बस तेरा सिर्फ तेरा मुझको साथ चाहिए

- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

आ गया लब पे तम्हारा नाम क्यूँ ...

अब कहीं दिल को मिले आराम क्यूँ
आ गया लब पे तुम्हारा नाम क्यूँ

शाम की क़िस्मत में ख़ुशबू ज़ुल्फ़ की
मेरी क़िस्मत में नहीं ये शाम क्यूँ

बारहा बिकना मुक़द्दर हो अगर
देखिये माथे पे लिक्खा दाम क्यूँ

काम हो जिसको तेरे दीदार से
ढूँढने निकले कहीं वो काम क्यूँ

छीन कर आँखों से जलवे यार के
छीनते हो हाथ से अब जाम क्यूँ

ये ग़ज़ल तो आप ही के नाम है
आप देते हैं इसे ईनाम क्यूँ

कौन ' तनहा ' से निभाए दोस्ती
ले कोई सर पे भला इलज़ाम क्यूँ

- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

एक सूरत भली भली सी है ...

आरज़ू कुछ लुटी लुटी सी है
ज़िन्दगी आजकल रुकी सी है

आपसे बात कम हुई जब से
हर तरफ़ कुछ कमी कमी सी है

आजकल हर घड़ी ख़यालों में
एक सूरत भली भली सी है

उनकी आंखों में डर रिवाजों का
मेरी आंखों में कुछ नमी सी है

वो चले छोड़ कर हमें 'तनहा'
रात भर जान पे बनी सी है

- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'

रविवार, 29 जून 2008

कुछ इम्तिहान बाक़ी ...

कुछ इम्तिहान गुजरे कुछ इम्तिहान बाक़ी
इक आसमाँ के आगे सौ आसमान बाकी

सय्याद की नज़र है और बेख़बर परिंदा
ये कौन जानता है कितनी उड़ान बाक़ी

उंगली तराश डालो आँखें निकाल फेंको
दिल की लगी सुना लूँ छोड़ो ज़ुबान बाक़ी

दामन छुड़ा के हमसे मुड - मुड के देखते हैं
रिश्ता अजीब सा है कुछ दरमियान बाक़ी

अंजाम तिशनगी का 'तनहा' लबों का जलना
हैं उनकी तिशनगी के लब पर निशान बाक़ी

शनिवार, 24 मई 2008

बैठे हैं इंतज़ार में...

'तनहा' उदास रात के लमहों की खैर हो
इक शम्म जल उठी है अंधेरों की खैर हो

बैठे हैं इंतज़ार में लौटेंगे वो कभी
बरसों की बात छोड़िये सदियों की खैर हो

होठों पे एक बात है होती नहीं बयाँ
सोचा है आज कह भी दें लफ़्ज़ों की खैर हो

उनको छुआ कि जिस्म को बिजली ने छू लिया
देखा है उनको बारहा आंखों की खैर हो

मौजों से आज हो गयी तूफाँ की दोस्ती
दरिया है बेलगाम किनारों की खैर हो

-- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'

सोमवार, 24 दिसंबर 2007

ज़िन्दगी क्या है ....

रात हमने नींद ली आराम की
जिन्दगी लगने लगी अब काम की

जिन्दगी क्या है हुआ एहसास तो
जिन्दगी हमने तुम्हारे नाम की

बन गईं फैशन की खबरें सुर्खियाँ
दब गयी हर बात कत्ले-आम की

आप के होठों ने जब से छू लिया
खुल गई तकदीर खाली जाम की

छोडिये किस्से वफा ओ इश्क के
आईये बातें करें कुछ काम की

सिर्फ लिखते हैं ग़ज़ल बेबह्र वो
फिर मिली उनको सज़ा ईनाम की
- प्रमोद कुश ' तनहा '