शनिवार, 3 मई 2008

आंसू भी खनकते हैं ...

हंसते हैं उजालों में रातों में तड़पते हैं
जज़्बात मुहब्बत के मुश्किल से संभलते हैं

ये इश्क नहीं आसाँ दरिया है शरारों का
जो मौज से बचते हैं साहिल पे पिघलते हैं

ज़ख्मों की कमाई है ख़्वाबों के खजाने हैं
पलकों की तिजोरी में आंसू भी खनकते हैं

जब याद सताती है भूले से सितमगर की
इक साथ कई शीशे नस नस में चट्कते हैं

आंखों की लड़ाई में कुछ हाथ नहीं आता
इस खेल में शातिर भी करवट ही बदलते हैं

कुछ वस्ल के अफ़साने कुछ हिज्र के नजराने
'तनहा' की निगाहों में दिन रात मचलते हैं

--- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा'

9 टिप्‍पणियां:

mehek ने कहा…

behad khubsurat,har sher dil ko chu gaya,bahut bahut badhai.tariff se badhkar hai har lafz ke kuch kehne ko baki nahi.

रश्मि प्रभा ने कहा…

aansu bhi khanakte hain.......
yahi mann ko chhu gai......

मीत ने कहा…

वाह ! बहुत बढ़िया है "तनहा" साहब.

kmuskan ने कहा…

Har sher khubsurat hai

pallavi trivedi ने कहा…

ज़ख्मों की कमाई है ख़्वाबों के खजाने हैं
पलकों की तिजोरी में आंसू भी खनकते हैं

waah...porri ghazal shaandaar hai. aur ye sher to bas katl hai..

meenakshi ने कहा…

its beautiful!! really..!!

Udan Tashtari ने कहा…

क्या बात है!! वाह!

seema gupta ने कहा…

aanhu bhee khenkteyn hai, kya khub byan kiya hai apne, dil kee gehrayeeon see jaisee aavaj aa rhee hai.....
regards

" ek chotte se rachna aapke nazar"

"अब और"

आँखों की गहराई मे आंसू कहीं दफ़न हो जाया करें ,
हर पल बरस कर सर -ऐ -महफिल तमाशा अब और बनाया ना करें .

अधूरी कहानी , प्यार का अफसाना कुछ भी मेरी ख्वावीश ना बने,
मोहब्बत की बातें मेरी तन्हाईयों को तन्हा अब और कर जाया ना करें.

कौन सी कयामत से गुजरा नही अब तलक ये नादाँ दिल मेरा ,
गम के बदल का रुख मेरी चौखट पे अब और आया ना करें .

कोई मुलाकात , जज्बात , एहसास , अब खंजर बन के दिल मे न चुभें,
वो लम्हा यादों के भवर मे मुझे अब और उलझाया न करें.

किसी माहोल , मंजर , महफिल से अब कोई रुसवाई न मिले मुझको ,
मुझको समझाने जिन्दगी रूप बदल बदल के अब और आया न करें

रजनी भार्गव ने कहा…

बहुत अच्छे शेर हैं।