मंगलवार, 27 मार्च 2012

यूं ही चलते हुए ...

यूं ही चलते हुए ...

यूं ही चलते हुए रुका होगा
फ़िर तेरे शहर में लुटा होगा

उसकी आँखें बहुत छलकती हैं
वो समंदर से खेलता होगा

ख़्वाब आते हैं बंद पलकों में
रात भर जागने से क्या होगा

आज माँ बाप की दुआ ले लूँ
मेरा आँगन हरा भरा होगा

कुछ तुम्हारी जफ़ा से टूट चुके
कुछ मुक़द्दर में ही लिखा होगा

रूठकर चल दिया मगर 'तनहा'
फ़िर किसी मोड़ पर खडा होगा

- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '

12 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

Bahut badhiya!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

उसकी आँखें बहुत छलकती हैं
वो समंदर से खेलता होगा

बहुत खूब ...सुंदर गजल



आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 29-०३ -2012 को यहाँ भी है

.... नयी पुरानी हलचल में ........सब नया नया है

Ramakant Singh ने कहा…

उसकी आँखें बहुत छलकती हैं
वो समंदर से खेलता होगा
SUNDAR BHAWABHIWYAKTI.

Ramakant Singh ने कहा…

उसकी आँखें बहुत छलकती हैं
वो समंदर से खेलता होगा
BEAUTIFUL LINES

Saras ने कहा…

कुछ तुम्हारी ज़फ़ा से टूट चुके
कुछ मुक़द्दर में ही लिखा होगा .....

ज़िन्दगी आँख से टपका हुआ बेरंग क़तरा
तेरे दमन की हवा पता तो आंसू होता

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut sundar ghazal umda ashaar.

उसकी आँखें बहुत छलकती हैं
वो समंदर से खेलता होगा..vaah is ashaar ke to kya kahne.

सदा ने कहा…

वाह ... बहुत ही बढि़या।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना...

anju(anu) choudhary ने कहा…

waah bahut badiya ख्वाबो के दामन से ...

शिखा कौशिक ने कहा…

BAHUT SUNDAR .BADHAI

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Prem Farukhabadi ने कहा…

aapki sari ghazlen bahut hi achchhi lagi dost,shukriya.

संजय भास्‍कर ने कहा…

उसकी आँखें बहुत छलकती हैं
वो समंदर से खेलता होगा

बहुत खूब ...सुंदर गजल