शुक्रवार, 28 दिसंबर 2007

दर्द के फ़साने ....

वही ख़्वाब मंज़िलों के , वही रास्तों के ग़म हैं
वही हौसले हमारे , वही आपके सितम हैं
कभी आंसुओं के किस्से , कभी दर्द के फ़साने
इस ज़िन्दगी पे जितनी ग़ज़लें कहें वो कम हैं

- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '

गुरुवार, 27 दिसंबर 2007

बचकर चला करें ...

हैं आप माहताब तो बेशक हुआ करें
रोशन यहाँ चराग है बचकर चला करें


एक और मुलाकात को वो बेकरार हो
बस पहली मुलाक़ात पे इतना खुला करें

हमने दवा तो की मगर रिश्ते न बच सके
अब दूरियां निभा सकें आओ दुआ करें

खामोशियों का और ही मतलब न ले कोई
होठों का इस्तेमाल भी थोडा किया करें

जाती हैं हिचकियाँ हमें मुश्किल में डाल के
'तनहा' का नाम रात को कम ही लिया करें

- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '

सोमवार, 24 दिसंबर 2007

ज़िन्दगी क्या है ....

रात हमने नींद ली आराम की
जिन्दगी लगने लगी अब काम की

जिन्दगी क्या है हुआ एहसास तो
जिन्दगी हमने तुम्हारे नाम की

बन गईं फैशन की खबरें सुर्खियाँ
दब गयी हर बात कत्ले-आम की

आप के होठों ने जब से छू लिया
खुल गई तकदीर खाली जाम की

छोडिये किस्से वफा ओ इश्क के
आईये बातें करें कुछ काम की

सिर्फ लिखते हैं ग़ज़ल बेबह्र वो
फिर मिली उनको सज़ा ईनाम की
- प्रमोद कुश ' तनहा '