गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008

आप समझें तो......

आप समझें तो कुछ कहें हम भी
आप कह दें तो कुछ सुनें हम भी

बैठिये तो हमारे पहलू में
कोई ताज़ा ग़ज़ल लिखें हम भी

इस समंदर में हैं छुपे मोती
साथ उतरें तो कुछ चुनें हम भी

मोड़ के उस तरफ़ उजाला है
मोड़ तक साथ तो चलें हम भी

रात की तीरगी नहीं जाती
चाँद दुश्मन है क्या करें हम भी

जी हुज़ूरों की भीड़ है हर सू
भीड़ टूटे तो फ़िर जुड़ें हम भी

हम मुसाफिर हैं और 'तनहा' भी
कोई खिड़की खुले ' रुकें हम भी '

प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'

6 टिप्‍पणियां:

विनय प्रजापति 'नज़र' ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत बात है ग़ज़ल में... वाह!!

*KHUSHI* ने कहा…

bahot hi badhiya likha hai Tanhaji... keep writing.....

pramod kumar kush 'tanha' ने कहा…

Aapka dil se shukriya...

Rama ने कहा…

डा. रमा द्विवेदी, हैदराबाद said...

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल लिखी है आपने.....मुबारकबाद एवं शुभकामनाएं।

आजकल आप कहां पर हैं....आशा है आप मुझे भूले नहीं होंगे...मैंने कई बार आपसे संपर्क करने की कोशिश की फोन पर लेकिन हो नहीं पाया....क्या आप अपना संपर्क सूत्र देना चाहेंगे...आशा है आप सपरिवार आनंद से होंगे....

Reetesh Gupta ने कहा…

जी हुज़ूरों की भीड़ है हर सू
भीड़ टूटे तो फ़िर जुड़ें हम भी

बहुत सुंदर ...अच्छी लगी आपकी गज़ल ..बधाई

seema gupta ने कहा…

बैठिये तो हमारे पहलू में
कोई ताज़ा ग़ज़ल लिखें हम भी
" wah iss sher ke aage ab kya khen hum, behtrin"
Regards