शनिवार, 19 दिसंबर 2009

आ गया लब पे तम्हारा नाम क्यूँ ...

अब कहीं दिल को मिले आराम क्यूँ
आ गया लब पे तुम्हारा नाम क्यूँ

शाम की क़िस्मत में ख़ुशबू ज़ुल्फ़ की
मेरी क़िस्मत में नहीं ये शाम क्यूँ

बारहा बिकना मुक़द्दर हो अगर
देखिये माथे पे लिक्खा दाम क्यूँ

काम हो जिसको तेरे दीदार से
ढूँढने निकले कहीं वो काम क्यूँ

छीन कर आँखों से जलवे यार के
छीनते हो हाथ से अब जाम क्यूँ

ये ग़ज़ल तो आप ही के नाम है
आप देते हैं इसे ईनाम क्यूँ

कौन ' तनहा ' से निभाए दोस्ती
ले कोई सर पे भला इलज़ाम क्यूँ

- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '

7 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

Harek sher khoobsoorst hai!

shama ने कहा…

Kya kamaal ka likhte hain aap!

*KHUSHI* ने कहा…

bahut badhiya pramodji..

Anamika ने कहा…

ये ग़ज़ल तो आप ही के नाम है
आप देते हैं इसे ईनाम क्यूँ
gazel ko gazel samajh
unhone inaam de diya
dil ka dard samjha nahi
sone k sikko me ishq tol diya.

कौन ' तनहा ' से निभाए दोस्ती
ले कोई सर पे भला इलज़ाम क्यूँ
tanha se koi lipata jana chaahta nahi
sab ko chaahiye mukhota jhoot ka aur hansi
nice sharing.

MUFLIS ने कहा…

शाम की क़िस्मत में ख़ुशबू ज़ुल्फ़ की
मेरी क़िस्मत में नहीं ये शाम क्यूँ

ye ग़ज़ल तो आप ही के नाम है
आप देते हैं इसे ईनाम क्यूँ

waah janaab...
kayaa khoobsurat sher keh daale aapne to.....lutf aa gayaa
poori gzl achhee bn padee hai

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत भाव भीनी कविता मन को भिगो गयी.गंभीर भाव लिए हुए इसके आगे कुछ कह नहीं सकती क्योंकि मैं निशब्द हूँ

zindagi ki kalam se! ने कहा…

bahut umda!