गुरुवार, 17 जनवरी 2008

सिर्फ़ मुड़ मुड़ के देखते जाओ ...

आग अश्कों से हम लगा लेंगे
उनके दामन से फिर हवा लेंगे

सिर्फ़ मुड़ मुड़ के देखते जाओ
बेवफ़ाई का ग़म उठा लेंगे

सोच पे आपकी हुकूमत है
एक शायर से और क्या लेंगे

आप बैठे हैं दिल के शीशे में
हाले - दिल आपको सुना लेंगे

आप 'तनहा' का साथ दे दें तो
जश्ने-महफ़िल को हम चुरा लेंगे

--- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'

बुधवार, 16 जनवरी 2008

कितने मीठे मीठे लोग.....

कितने मीठे मीठे लोग
देखो कितने फीके लोग

रोयेगा मत चख़ कर देख
हैं मिर्ची से तीखे लोग

देख पड़ोसी की तकलीफ़
दीये जलाते घी के लोग

तू अपने बचने की सोच
तेरे आगे - पीछे लोग

इक तन्हा की सुनता कौन
जिसका वक़्त उसी के लोग

-- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'

मंगलवार, 15 जनवरी 2008

मुझे सपने नहीं आते ....

आजकल
मुझे सपने नहीं आते ।
क्योंकि
सपनों के लिए
आवश्यकता है नींद की ,
और नींद उड़ चुकी है
कब की
रोज़ की चीख़ पुकार में ।
धर्म और राजनीति की
उठक - पठक
एवं व्यवसायिक जोड़ - तोड़ में ।

आजकल
खुली आंखों से देखता हूँ
तस्वीरें -
मरती हुई सभ्यता ,
सिसकती हुई संस्कृति
एवं
दम तोड़ती हुई
इंसानियत की ।

शुभकामनाएं

बात हो सद्भावना की ज़िक्र हो विश्वास का
छोड़ दें शिकवे गिले बस साथ हो उल्लास का

गीत हो , संगीत हो और प्रेम ही कविता बने
शब्द के झरनों से मिलकर ज़िन्दगी सरिता बने

- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'

शनिवार, 12 जनवरी 2008

वो हमारे थे ...

हम ये समझे थे वो हमारे थे
हम इसी सोच के सहारे थे

मेरे दामन में कुछ दुआएं थीं
मेरे आँगन में चाँद तारे थे

हुस्न और मौज से वही छूटे
जिनकी तक़दीर में किनारे थे

रात को तो सुकून मिलना था
हमने काँटों पे दिन गुज़ारे थे

ख़्वाब की उस गली पे जाँ सदके
जिस गली क़ाफ़िले तुम्हारे थे

-- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '

शुक्रवार, 4 जनवरी 2008

कोई मिल जाये तो ...

जिन्दगी ख़वाब है पलकों पे सजा के रखिये
प्यार की शमा को सीने में जला के रखिये
यार सच्चे बड़ी मुश्किल से मिला करते हैं
कोई मिल जाये तो धड़कन में छुपा के रखिये

- प्रमोद कुमार कुश 'तनहा'

मंगलवार, 1 जनवरी 2008

रात तो होती है ...

दिन अगर हासिल नहीं हैं , रात तो होती है।
ग़म की तमाम उम्र ही बरसात तो होती है।
कुछ फ़र्क नहीं हमसे वो नाराज़ हैं 'तनहा'
तन्हाईयों से अपनी भी कुछ बात तो होती है।